सुद्ध सत्व समता बिज्ञाना।
कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।।
कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।।
(मानस, ७/१०३/२)
जिसमें सत्वगुण ही कार्यरत हो, समता आ गई हो, विषमता सदा-सदा के लिए समाप्त हो गई हो, विज्ञान अर्थात् अनुभवी उपलब्धि हो, प्रत्येक समस्या पर इष्ट से निर्णय मिलने लगे, असीम प्रसन्नता की अनुभूति हो, ऐसा पुरुष सत्ययुगीन है। इसी प्रकार-
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा।
सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।।
(मानस, ७/१०३/३)
सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।।
(मानस, ७/१०३/३)
सत्त्व अधिकाँश मात्रा में हो, कुछ राजसी गुण हों, कर्म अर्थात् आराधना में पूर्ण अनुरक्ति हो, सब प्रकार की शान्ति हो- यह त्रेता का विशेष लक्षण है। जिसके हृदय में उपर्युक्त गुण हों उसे त्रेता-श्रेणी का साधक कहा जाता है। पुनः-
बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस।
द्वापर धर्म हरष भय मानस।।
(मानस, ७/१०३/४)
द्वापर धर्म हरष भय मानस।।
(मानस, ७/१०३/४)
राजसी गुणों के साथ-साथ सत्व एवं तामसी गुणों का किंचित् मिश्रण हो, हृदय में कभी हर्ष और कभी भय बना रहे तो साधक द्वापरयुगीन है। दुविधा से द्वापर बना है। यदि साधना में हर्ष-विषाद का आरोह-अवरोह लगा है, दुविधा बनी है तो साधक द्वापरयुगीन है। और अन्त में-
तामस बहुत रजोगुन थोरा।
कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।।
(मानव, ७/१०३/५)
कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।।
(मानव, ७/१०३/५)
जहाँ अधिकाँश तामसिक वृत्ति हो, रंचमात्र राजसी गुण हों, मन में चारों ओर बैर और विरोध भरा हो- ऐसा हृदय कलियुग का परिचायक है। यदि इस स्तर पर साधक जीवित है तो सिद्ध है कि वह कलियुगीन है। इस स्तर पर उसमें वे सभी लक्षण विद्यमान रहेंगे, जिनकी गणना गोस्वामीजी ने कलि-प्रसंग में की है।
जब मन में उच्छृंखलता है, वैर-विरोध ही है, बुद्धि विकल है तो भला मनुष्य-तन की सार्थकता क्या है? बड़े भाग्य से मानव-तन मिला तो कल्याण कैसे हो? ऐसी स्थिति में हम भजन कहाँ से आरम्भ करें?
बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक संवारा।।
(मानस, ७/४२/७-८)
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक संवारा।।
(मानस, ७/४२/७-८)
बड़े भाग्य से मानव-तन मिला है। अरे, पशु-पक्षी सभी तो जी रहे हैं। कौआ भी सुखी है। बड़े ताव से उड़ता है, पेड़ पर बैठता है: फिर मनुष्य में कौन-सा बड़ा भाग्य है? इसलिये कि शेष चौरासी लाख योनियाँ केवल भोग भोगने के लिए हैं किंतु मनुष्य स्वयं कर्मो का रचयिता है। बुरे से बुरे संस्कारों को काटने की इसमें क्षमता है, बशर्ते कि कर्म की क्रिया को समझ ले। अपने लक्ष्य को मन में, हृदय में स्थान भर दिये रहे। यह साधन का धाम, मुक्ति का दरवाजा है। इसको पाकर जिसने अपना निज परलोक नहीं सुधार लिया (किसी पर एहसान न करें, किसी की भलाई न करें, केवल अपनी भलाई तो कर लें)।
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