इसी प्रकार का छल उन्होंने (आतापी और वातापी ने) महर्षि अगस्त्य के साथ भी किया। जब वे उन्हें निमन्त्रित करने चले तो छोटे ने सावधान किया कि वे महात्मा बड़े खतरनाक हैं, उन्हें न छेड़ो। बड़े ने झिड़का- तुम तो बड़े कायर निकले! कैसा तपोधन? तपस्या क्या होती है? अस्तु, महर्षि अगस्त्य उस भक्त के यहाँ पहुँचे। आतिथ्य के पश्चात् जब वे लौटने लगे तो बड़े भाई ने छोटे को आवाज दी। महर्षि के पेट में हलचल होने लगी। ध्यान से देखा तो पता चला कि राक्षस पेट के भीतर है। तुरन्त उन्होंने कमण्डल से जल लिया, बाहर छिड़का, पेट पर हाथ फेरा और 'आतापी वातापी स्वाहा' करते ही भीतर का राक्षस भीतर और बाहर का राक्षस बाहर ही समाप्त हो गया। इस प्रकार महर्षि अपनी तपस्या के प्रभाव से बचे। वैसे निशाचरों ने छोड़ा किसी को नहीं था। हिरण्यकशिपु ने भी छोड़ा नहीं था। वह तो प्रह्लाद अपनी शक्ति से बच गया अथवा प्रभु को इतना अनुकूल कर चुका था कि बचता गया। इतने पर भी गोस्वामीजी कहते हैं, ऐसे अधम खल सतयुग और त्रेता में होते ही नहीं। वास्तविकता तो यह है कि आज से भी अधम नरों का प्रणाम उस युग में पाया जाता है। फिर गोस्वामीजी तुलसीदास कहना क्या चाहते हैं? अंत में वे स्वयं निर्णय देते हैं-
नित जुग धर्म होहिं सब केरे।
हृदयँ राम माया के प्रेरे।।
(मानस, ७/१०३/१)
हृदयँ राम माया के प्रेरे।।
(मानस, ७/१०३/१)
सभी युगों के धर्म सबके हृदय में नित्य होते रहते हैं। 'हृदयँ राम माया के प्रेरे'- भगवान की माया की प्रेरणा से होते हैं। माया के दो रूप हैं- एक तो अविद्या माया है, जो विभिन्न योनियों का कारण होती है। दूसरी राममाया है जिसे विद्या भी कहते हैं। यह हरि-प्रेरित होती है और साधनात्मक क्रिया से ही इसकी जागृति सम्भव है। अविद्या माया की सीमा पार कर लेने पर राममाया की प्रेरणा से साधक के हृदय में क्रमशः चारो युगों के गुण-धर्मो का प्राकट्य होता है। वास्तव में यह भी भगवत्पथ की चार श्रेणियाँ हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे गीतोक्त वर्ण-व्यवस्था। अब पहचाना कैसे जाय कि हृदय में कौन-सा युग आया? गोस्वामीजी पहचान बताते हैं-
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