ऐतिहासिक प्रमाणों से ज्ञात होता है कि सतयुग में हिरण्यकशिपु नामक एक नरेश हुआ। अपनी वेधशाला में उसने ऐसा आविष्कार कर लिया कि न दिन में मरे, न रात में मरे। न अस्त्र-शस्त्र से मरे, न पशु-पक्षी से, न मानव से। जब उसने देखा कि हमें मरना ही नहीं है फिर भगवान की क्या आवश्यकता? अतः उसने घोषणा करा दी कि मैं ही भगवान् हूँ। जो भी मुझसे भिन्न किसी भगवान का नाम ले उसे मृत्युदण्ड दिया जाय। अपने सिद्धांत का वह इतना कट्टर था कि अपने इकलौते बेटे प्रह्लाद को भी वह क्षमा नहीं कर सका। प्रह्लाद को भी फाँसी पर चढ़ा ही दिया। मारने के अनेक प्रयत्न किये गये किन्तु भक्त प्रह्लाद का रक्षक तो कोई और था। वस्तुतः यदि भगवान एक अबोध शिशु का भी स्पर्श कर दे तो संसार में कोई शक्ति नहीं जो उसे मिटा दे। भगवान का वरदहस्त प्रह्लाद पर रहा और उसके माध्यम से उस युग में भक्ति की एक लहर सर्वत्र दौड़ गई।
इस प्रकार उस सतयुग में भी ऐसी परिस्थिति आयी कि धर्म की चर्चा-मात्र करने पर मृत्युदण्ड का विधान था और तुलसीदास कहते हैं, 'ऐसे अधम मनुज खल'- ऐसे अधम मनुष्य 'कृतजुग त्रेताँ नाहिं'- सतयुग और त्रेता में होते ही नहीं। जबकि उसी सतयुग में ऐसे भयंकर लोग हुए कि भगवान का नाम लेने पर फाँसी की सजा देते थे। आज कोई फाँसी तो नहीं देता, बहुत हुआ तो दस लोग छींटाकशी करेंगे; किन्तु उतने ही प्रशंसक भी मिलेंगे कि दादाजी महात्माओं के यहाँ जाते हैं, तीर्थयात्रा करते हैं। चौथेपन की यही शोभा है; इत्यादि।
आइये, उस त्रेता पर दृष्टिपात करें जिसका इतिवृत्त 'मानस' में चित्रित है। त्रेता में भी अधम नर थे। रावण 'धर्म सुनिअ नहिं काना। आपुनु उठि धावइ, रहै न पावइ' (मानस, १/१८२/छ.)- धर्म कानों से सुन भर पाता तो बौखलाकर स्वयं चल पड़ता था। धर्म को नष्ट करने के लिए 'फोर्स' भेज देता था। अधर्मियों को नष्ट करने की आज्ञा नहीं थी, केवल धर्मियों को ही निर्मूल करने की योजना थी। चोर-डाकुओ को नष्ट नहीं करना था बल्कि राम-राम कहनेवालों को नष्ट करने का आदेश था। ऋषि-महात्माओं से भी कर के रूप में रक्त वसूला जाता था। उनका अपराध मात्र इतना था कि भगवान का नाम लेते थे। गुप्त रूप से निशाचरों की टुकड़ियाँ चला करती थीं, जो धार्मिकों को अकेला पाते ही मारकर चट कर डालती थीं। वनवासी राम जब चित्रकूट से आगे बढ़े तो नर-कंकालों का एक पहाड़ मिला-
अस्थि समूह देखि रघुराया।
पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।।
(मानस, ३/८/६)
पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।।
(मानस, ३/८/६)
हड्डियों का विशाल संग्रह देखकर भगवान राम ने मुनियों से पूछा कि ये नरकंकाल कैसे हैं? मुनियों ने कहा, 'आप तो अन्तर्यामी हैं, जानते हुए भी क्यों पूछते हैं? परन्तु जब आप पूछते ही हैं तो बताना कर्तव्य होता है। 'निसिचर निकर सकल मुनि खाए।' (मानस, ३/८/८)- निशाचरों ने सम्पूर्ण मुनियों को खा डाला। यह उन्हीं हड्डियों का ढेर है। आज आप नाम तो ले सकते हैं? कोई टैक्स तो नहीं लेता? वेद-पुराण कहने पर देश-निकाला तो नहीं मिलता? उस समय युग कौन-सा था? त्रेता! और गोस्वामीजी कहते हैं कि ऐसे अधम खल कृतयुग और त्रेता में होते ही नहीं!
||ॐ श्री परमात्मने नमः||
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