Thursday, 30 June 2016

रोज का खाना बनाने वाली माँ हमें याद रहती


रोज का खाना बनाने वाली माँ हमें याद रहती
है,
लेकिन जीवन भर के खाने की
व्यवस्था करने वाला बाप हम भूल जाते हैं ।
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माँ रोती है, बाप नहीं रो सकता, खुद का पिता मर जाये फ़िर
भी नहीं रो सकता,
क्योंकि छोटे भाईयों को
संभालना है,
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माँ की मृत्यु हो जाये भी वह
नहीं रोता क्योंकि बहनों को सहारा देना होता है,
.
पत्नी हमेशा के लिये साथ छोड जाये फ़िर भी
नहीं रो सकता,
.
क्योंकि बच्चों को सांत्वना
देनी होती है ।
देवकी-यशोदा की तारीफ़ करना
चाहिये,
लेकिन बाढ में सिर पर टोकरा उठाये वासुदेव को
नहीं भूलना चाहिये...
.
राम भले ही
कौशल्या का पुत्र हो लेकिन उनके वियोग में तड़प कर जान देने वाले
दशरथ ही थे ।
.
पिता की एडी़ घिसी हुई
चप्पल देखकर उनका प्रेम समझ मे आता है,
उनकी
छेदों वाली बनियान देखकर हमें महसूस होता है कि
हमारे हिस्से के भाग्य के छेद उन्होंने ले लिये हैं...
.
लड़की को गाऊन ला देंगे,
बेटे को ट्रैक सूट ला देंगे,
लेकिन खुद पुरानी पैंट पहनते रहेंगे ।
.
बेटा कटिंग पर
पचास रुपये खर्च कर डालता है और बेटी
ब्यूटी पार्लर में,
लेकिन दाढी़
की क्रीम खत्म होने पर एकाध बार
नहाने के साबुन से ही दाढी बनाने वाला पिता
बहुतों ने देखा होगा...
.
बाप बीमार नहीं पडता,
बीमार
हो भी जाये तो तुरन्त अस्पताल नहीं जाते,
डॉक्टर ने एकाध महीने का आराम बता दिया तो
उसके माथे की सिलवटें गहरी हो
जाती हैं,
.
क्योंकि लड़की की
शादी करनी है,
.
बेटे की शिक्षा
अभी अधूरी है...
आय ना होने के बावजूद बेटे-बेटी को मेडिकल / इंजीनियरिंग
में प्रवेश करवाता है..
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कैसे भी "ऎड्जस्ट" करके बेटे
को हर महीने पैसे भिजवाता है.. (

आजकल बच्चों के माता पिता बहुत असमंजस


आजकल बच्चों के माता पिता बहुत असमंजस में हैं -                                       
अपने बच्चों के भविष्य को लेकर ....                                                                                     
बच्चों को चाय की दुकान पर बैठाएं और मोदी जैसा बनाएं   ...                     
या
उनको आई आई टी भेजें और केजरीवाल जैसा बनाएँ        ...      
या        ...
विदेश भेजें और कोई कोर्स नहीं करवावें ताकि राहुल गाँधी जैसा बन सके    ...
!!! वाकई Hard Decision है !!!
या
फिर उसे हरिद्वार भेज दें ताकि आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर सके और स्वामी रामदेव जैसा बन सके जिनकी सालाना आय करोड़ों में है 
या
सिर्फ नवीं फेल ही रहने दे ताकि बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव जैसे बन सकें 

वास्तव में बहुत ही कठिन निर्णय है ! ! !

श्री राम चरित मानस में प्रभु की नाम वंदना का एक सुन्दर


श्री राम चरित मानस में प्रभु की नाम वंदना का एक सुन्दर प्रसंग है  - 
"सुमिरि पवन सुत पावन नामू। 
अपने बस करि राखे रामू॥" 
('श्री हनुमान्‌जी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्री रामजी को अपने वश में कर रखा है।') 
हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के उपरान्त प्रभु श्रीराम जी से कहते हैं कि हे प्रभु! आज मेरा ये भ्रम टूट गया कि मै ही सबसे बड़ा भक्त, राम नाम का जप करने वाला हूँ। भगवान बोले वह कैसे ? हनुमान जी बोले - वास्तव में तो भरत जी संत है और उन्होंने ही राम नाम जपा है। आपको पता है जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी तो मै संजीवनी लेने गया पर जब मुझे भरत जी ने बाण मारा और मै गिरा, तो भरत जी ने, न तो संजीवनी मंगाई, न वैद्य बुलाया। कितना भरोसा है उन्हें आपके नाम पर, आपको पता है उन्होंने क्या किया। 
"जौ मोरे मन बच अरू काया।
प्रीति राम पद कमल अमाया॥ 
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। 
जौ मो पर रघुपति अनुकूला॥ 
सुनत बचन उठि बैठ कपीसा।
कहि जय जयति कोसलाधीसा॥" 
यदि मन वचन और शरीर से श्री राम जी के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो तो यदि रघुनाथ जी मुझ पर प्रसन्न हो तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित हो जाए। यह वचन सुनते हुई मै श्री राम, जय राम, जय-जय राम कहता हुआ उठ बैठा। मै नाम तो लेता हूँ पर भरोसा भरत जी जैसा नहीं किया, वरना मै संजीवनी लेने क्यों जाता। 
(बस ऐसा ही हम सब करते है हम नाम तो भगवान का लेते है पर भरोसा नही करते, बुढ़ापे में बेटा ही सेवा करेगा, बेटे ने नहीं की तो क्या होगा? उस समय हम भूल जाते है कि जिस भगवान का नाम हम जप रहे हैं वे हैं न, पर हम भरोसा नहीं करते। बेटा सेवा करे न करे पर भरोसा हम उसी पर करते है।) 
 हनुमान जी कहते हैं - दूसरी बात प्रभु! बाण लगते ही मैं गिरा, पर्वत नहीं गिरा, क्योंकि पर्वत तो आप उठाये हुए थे और मैं अभिमान कर रहा था कि मैं उठाये हुए हूँ। मेरा दूसरा अभिमान भी टूट गया।
(इसी तरह हम भी यही सोच लेते है कि गृहस्थी के बोझ को मै उठाये हुए हूँ।)  
फिर हनुमान जी कहते है - और एक बात प्रभु ! आपके तरकस में भी ऐसा बाण नहीं है जैसे बाण भरत जी के पास है। आपने सुबाहु मारीच को बाण से बहुत दूर गिरा दिया, आपका बाण तो आपसे दूर गिरा देता है, पर भरत जी का बाण तो आपके चरणों में ला देता है। मुझे बाण पर बैठाकर आपके पास भेज दिया। भगवान बोले - हनुमान जब मैंने ताडका को मारा और भी राक्षसों को मारा तो वे सब मरकर मुक्त होकर मेरे ही पास तो आये, इस पर हनुमान जी बोले प्रभु आपका बाण तो मरने के बाद सबको आपके पास लाता है पर भरत जी का बाण तो जिन्दा ही भगवान के पास ले आता है। 
भरत जी संत है और संत का बाण क्या है? संत का बाण है उसकी वाणी। लेकिन हम करते क्या हैं, हम संत वाणी को समझते तो हैं पर सेवन नहीं करते हैं, और औषधि सेवन करने पर ही फायदा करती है। 
हनुमान जी को भरत जी ने पर्वत सहित अपने बाण पर बैठाया तो उस समय हनुमान जी को थोडा अभिमान हो गया कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा ? परन्तु जब उन्होंने रामचंद्र जी के प्रभाव पर विचार किया तो वे भरत जी के चरणों की वंदना करके चल देते हैं। इसी तरह हम भी कभी-कभी संतों पर संदेह करते हैं कि ये हमें कैसे भगवान तक पहुँचा देंगे? संत ही तो हैं जो हमें सोते से जगाते है जैसे हनुमान जी को जगाया, क्योंकि उनका मन, वचन, कर्म सब भगवान में लगा है। आप उन पर भरोसा तो करो, तुम्हें तुम्हारे बोझ सहित भगवान के चरणों तक पहुँचा देंगे। 
सादर हरि ॐ ! 

Interview excel ka


*Interview*
Interviewer -  Tumko excel ata hai kya.
He -  Aa to jayega,  par bahut dhila hoga 
*Slapped and Rejected*

कुछ हँस के बोल दिया करो,


कुछ हँस के
     बोल दिया करो,
कुछ हँस के 
      टाल दिया करो,
यूँ तो बहुत 
    परेशानियां है 
तुमको भी 
     मुझको भी,
मगर कुछ फैसले 
     वक्त पे डाल दिया करो,
न जाने कल कोई 
    हंसाने वाला मिले न मिले..
इसलिये आज ही 
      हसरत निकाल लिया करो !!
हमेशा समझौता 
      करना सीखिए..
क्योंकि थोड़ा सा  
      झुक जाना 
किसी रिश्ते को
         हमेशा के लिए 
तोड़ देने से 
           बहुत बेहतर है ।।।
किसी के साथ
     हँसते-हँसते
उतने ही हक से 
      रूठना भी आना चाहिए !
अपनो की आँख का
     पानी धीरे से 
पोंछना आना चाहिए !
      रिश्तेदारी और 
दोस्ती में 
    कैसा मान अपमान ?
बस अपनों के  
     दिल मे रहना 
आना चाहिए...!

Kanyadaan----aaj ki maa ki najron se................




कन्यादान जाओ , मैं नहीं मानती कुछ , वैसे भी मेरी बेटी कोई चीज़ नहीं , जिसको दान में दे दूँ ;
मैं बांधती हूँ बेटी तुम्हें एक पवित्र बंधन में ,
तुम दोनों मिल के निभाना इसे ,
मैं तुम्हें अलविदा नहीं कह रही ,
आज से तुम्हारे दो घर ,
जब जी चाहे आना तुम ,
तुम्हारा यह कमरा हमेशा यूँ ही रहेगा जहाँ जा रही हो ,
खूब प्यार बरसाना तुम ,
सब को अपना बनाना तुम ,
पर कभी भी ,
न मर मर के जीना ,
न जी जी के मरना तुम ,
तुम अन्नपूर्णा , शक्ति , रति सब तुम ,
ज़िंदगी को भरपूर जीना तुम ,
न तुम बेचारी , न अबला ,खुद को विक्टिम कभी न समझना तुम ,
मैं दान नहीं कर रही तुम्हें ,
मोहब्बत के एक और बंधन में बाँध रही हूँ ,
उसे बाखूबी निभाना तुम.

आसक्ति करनी हो तो भगवान के नामरूप में करो।

आसक्ति करनी हो तो भगवान के नामरूप में करो।
कामना  करनी  हो तो निर्मल  भजन  की  करो।।
क्रोध  करना  हो  तो  अपने  दुर्गुणों  पर  करो।
लोभ  करना  हो  तो भगवान के स्मरण का करो।।
मोह  करना  हो  तो  भगवान की लीला में करो।
मद  करना  हो  तो  भगवत्-प्रीति  का  करो।
अभिमान करना हो तो भगवान के दासत्व का करो।।
वैर  करना  हो  तो  अपने  दुराचारों  से करो।
हिंसा  करनी  हो  तो  अपने  अज्ञान की करो।।
समीप  रहना  हो  तो  भगवच्चरणों  के  रहो।
दूर  रहना   हो  तो   बुरे   संग  से  रहो।।