Thursday, 12 May 2016

जिन्दगी की दौड़ में, तजुर्बा कच्चा ही रह गया

जिन्दगी की दौड़ में,
तजुर्बा कच्चा ही रह गया...
हम सिख न पाये 'फरेब'
और दिल बच्चा ही रह गया !
बचपन में जहां चाहा हंस लेते थे,
जहां चाहा रो लेते थे...
पर अब मुस्कान को तमीज़ चाहिए
और आंसुओ को तन्हाई !
हम भी मुस्कराते थे कभी बेपरवाह अन्दाज़ से...
देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में !
चलो मुस्कुराने की वजह ढुंढते हैं...
जिन्दगी तुम हमें ढुंढो...
हम तुम्हे ढुंढते हैं ...!!!

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