Thursday, 2 June 2016

जिस प्रकार नींबू के रस की एक बूँद हजारों लीटर


जिस प्रकार नींबू  के रस
            की एक बूँद हजारों लीटर
            दूध बर्बाद कर देती है ।

      उसी  प्रकार  मनुष्य का
            अहंकार  भी  अच्छे  से
            अच्छे सम्बंधो को बर्बाद
            कर देता है ।

           शुभ:  प्रभात्
    आज का दिन
            आपका शुभ हो.....

इन्सान की जिन्दगी में खुशियां उस ब्याज की


   ☀   इन्सान की जिन्दगी में
            खुशियां उस ब्याज की
            तरह से होती हैं....

    ☀   ....जिसको जितनी भी
            देंगे दुगनी तिगुनी होकर
            ही लौटेगी ।

            🙏  शुभ:  प्रभात्
    ☀  आज (सोमवार) का दिन
            आपका शुभ हो...

मै भले ही वो काम नहीं करता,

मै भले ही वो काम नहीं
            करता, जिससे भगवान
            मिले.....
            पर वो काम जरुर करता
            हूँ जिससे दुआ मिले ।

      इन्सानियत दिल में होती
            है, हैसियत में नहीं.....
            ऊपर वाला केवल 'कर्म'
            देखता है वसीयत नहीं ।

             शुभ:  प्रभात्  

सत्य की भूख तो सबको


  सत्य की भूख तो सबको
            होती है लेकिन जब सत्य
            परोसा जाता है...
      ...तब बहुत ही कम लोगों
            को ही इसका स्वाद अच्छा
            लगता है ।
              शुभ:  प्रभात्  
     आज  का दिन
            आपका शुभ हो.....

Acceptance When we don't accept an undesired event

 *Acceptance*
When we don't accept an undesired event, it becomes *Anger*;
when we accept it, it becomes *Tolerance.*
When we don't accept uncertainty, it becomes *Fear*;
when we accept it, it becomes *Adventure.*
When we don't accept other's bad behaviour towards us, it becomes *Hatred;*
when we accept it, it becomes *Forgiveness.*
When we don't accept other's Success, it becomes *Jealousy;* when we accept it, it becomes *Inspiration.*
Acceptance is the key to handling life well.

💝☕ Good Morning

Wife: Aaj tum daaru peeke aaye ho

Monday Night:
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Wife: Aaj tum daaru peeke aaye ho ! Kyun?
Husband : Arre Aaj office mai foreign clients k saath meeting thi to peeni padi

Tuesday Night:
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Wife: Aaj tum fir daaru peeke aaye ho ! Kyun?
Husband : Arre Aaj mere ek friend ki engagement thi to Usne party di isliye

Wednesday Night:
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Wife: Aaj bhi tum peeke aaye..
Husband: Arre Aaj ek friend ka breakup ho gaya...WO bahut udaas tha to Uska mood fresh karne ke liye...

Thursday Night:
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Wife: Aaj fir se...Ab kiska breakup ho gaya?
Husband: Breakup nahi....Aaj Office mai work load tha...bahut tension thi....isliye

Friday Night:
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Wife: Aaj kyun?
Husband : Arre jis friend ki engagement thi na Tuesday ko, Aaj uski shaadi thi...to khushi ke mauke pe to....samajh gayi na

Saturday Night:
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Wife: hmmm...Ab?
Husband : Aaj purane school friends mil gaye the to WO disco le gaye aur zabardasti pila di...maine bahut mana bhi kiya par maane nahi...

Sunday Night:
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Wife (gusse se): Ab Aaj kya ho gaya..?
Husband : SALA  AADMI EK DIN BHI APNI MARJI SE NAHI PI SAKTA HAI KYA...??

सुद्ध सत्व समता बिज्ञाना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना

सुद्ध सत्व समता बिज्ञाना।
कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।।

(मानस, ७/१०३/२)
   जिसमें सत्वगुण ही कार्यरत हो, समता आ गई हो, विषमता सदा-सदा के लिए समाप्त हो गई हो, विज्ञान अर्थात् अनुभवी उपलब्धि हो, प्रत्येक समस्या पर इष्ट से निर्णय मिलने लगे, असीम प्रसन्नता की अनुभूति हो, ऐसा पुरुष सत्ययुगीन है। इसी प्रकार-
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा।
सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।।
(मानस, ७/१०३/३)
  सत्त्व अधिकाँश मात्रा में हो, कुछ राजसी गुण हों, कर्म अर्थात् आराधना में पूर्ण अनुरक्ति हो, सब प्रकार की शान्ति हो- यह त्रेता का विशेष लक्षण है। जिसके हृदय में उपर्युक्त गुण हों उसे त्रेता-श्रेणी का साधक कहा जाता है। पुनः-
बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस।
द्वापर धर्म हरष भय मानस।।
(मानस, ७/१०३/४)
राजसी गुणों के साथ-साथ सत्व एवं तामसी गुणों का किंचित् मिश्रण हो, हृदय में कभी हर्ष और कभी भय बना रहे तो साधक द्वापरयुगीन है। दुविधा से द्वापर बना है। यदि साधना में हर्ष-विषाद का आरोह-अवरोह लगा है, दुविधा बनी है तो साधक द्वापरयुगीन है। और अन्त में-
तामस बहुत रजोगुन थोरा।
कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।।
(मानव, ७/१०३/५)
   जहाँ अधिकाँश तामसिक वृत्ति हो, रंचमात्र राजसी गुण हों, मन में चारों ओर बैर और विरोध भरा हो- ऐसा हृदय कलियुग का परिचायक है। यदि इस स्तर पर साधक जीवित है तो सिद्ध है कि वह कलियुगीन है। इस स्तर पर  उसमें वे सभी लक्षण विद्यमान रहेंगे, जिनकी गणना गोस्वामीजी ने कलि-प्रसंग में की है।
  जब मन में उच्छृंखलता है, वैर-विरोध ही है, बुद्धि विकल है तो भला मनुष्य-तन की सार्थकता क्या है? बड़े भाग्य से मानव-तन मिला तो कल्याण कैसे हो? ऐसी स्थिति में हम भजन कहाँ से आरम्भ करें?
बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक संवारा।।
(मानस, ७/४२/७-८)
बड़े भाग्य से मानव-तन मिला है। अरे, पशु-पक्षी सभी तो जी रहे हैं। कौआ भी सुखी है। बड़े ताव से उड़ता है, पेड़ पर बैठता है: फिर मनुष्य में कौन-सा बड़ा भाग्य है? इसलिये कि शेष चौरासी लाख योनियाँ केवल भोग भोगने के लिए हैं किंतु मनुष्य स्वयं कर्मो का रचयिता है। बुरे से बुरे संस्कारों को काटने की इसमें क्षमता है, बशर्ते कि कर्म की क्रिया को समझ ले। अपने लक्ष्य को मन में, हृदय में स्थान भर दिये रहे। यह साधन का धाम, मुक्ति का दरवाजा है। इसको पाकर जिसने अपना निज परलोक नहीं सुधार लिया (किसी पर एहसान न करें, किसी की भलाई न करें, केवल अपनी भलाई तो कर लें)।